BHAGWAN BABU 'SHAJAR'

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असमंजस

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हर तरफ है धुन्ध धुंध,
कहूँ भी कुछ तो क्या कहूँ
एक जाल से घिरा हुआ,
कर-पग भी है बँधा हुआ।
कौन हूँ, कहाँ हूँ मैं,
क्यों हूँ मैं, क्यों आया हूँ,
कुछ मुझे पता नहीं।
बाल हूँ या, बाला हूँ मैं,
किसी ने अभी, कहा नहीं।
जाउँ न जाउँ, दुनिया में उस
पहले से ही जाल एक
जिस जहाँ में है बुना हुआ।
जो सोचकर मैं आ रहा,
हूँ यहाँ कुछ करने की,
अब भूलता, ये देखकर,
तस्वीर मेरी गढ़ रहे सब
मुझको देखने से पहले,
तकदीर मेरी बुन रहे सब,
मुझसे पूछने से पहले,
नाम मेरी गुन रहे सब,
कर्म देखने से पहले।
हंस रहा हूँ मन-ही-मन
आकलन करता हुआ।
कि ऐसे जगत में आना मेरा
अच्छा हुआ या बुरा हुआ।
निश्चित जहाँ है, पहले से ही,
करने को और कुछ नहीं,
सोचता ये गर्भ में,
बीज एक पड़ा हुआ।



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7 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Bhagwan Babu 'Shajar' के द्वारा
December 9, 2013

जागरण परिवार ने इस रचना को टॉप हिन्दी के लिए चुना.. जागरण परिवार को धन्यवाद…

yamunapathak के द्वारा
December 9, 2013

बहुत अच्छी भावाभिव्यक्ति है. साभार

    Bhagwan Babu 'Shajar' के द्वारा
    December 9, 2013

    आपकी ऐसी प्रतिक्रिया हमारे लिए सुखद है…

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
December 8, 2013

शजर जी ! अच्छा आत्म-मंथन ! पड़े हुए बीज को बोएं और उसे अंकुरित होने दें ! पुनश्च !!

    Bhagwan Babu 'Shajar' के द्वारा
    December 9, 2013

    अच्छे विचार है आपके .. . . आपका धन्यवाद…

December 7, 2013

lagbhag sabhi hain is asmanjas me pade hue .sundar abhivyakt kiya hai ek मानव के मन की दुविधा को

    Bhagwan Babu 'Shajar' के द्वारा
    December 9, 2013

    धन्यवाद….. शालिनी जी


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