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कैसे है ये धर्म और धर्म के रखवाले

Posted On: 21 Dec, 2013 social issues,Junction Forum,Politics में

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किसी धार्मिक समुदाय की कैसी ये भावनाएँ है, कैसी ये आस्थाएँ है, जो अपने धर्म को सिवाय एक छोटे-से चराग़ के अलावा कुछ नही समझती । जो हवा के एक छोटे से झोंके झेलने की गुंजाईश नही रखती। और वो भी धर्म की वो छोटी सी बातें जिसका कोई अस्तित्व नही, किसी मनोरंजन के रूप में इस्तेमाल करने से धर्म की वो मजबूत दीवारें भरभरा कर टूटने लगती है, जो धर्म मनुष्यों और विशेष समुदाय को संस्कारित और जीने का सलीका देने का दावा करती है। अक्सर ऐसा देखा गया है कि जब भी किसी टीवी शो, फिल्म या सामाजिक नाटकों में धर्म की कुछ बातें हुई नही कि विवाद शुरू हो जाते है। धर्म का अपमान होने लगता है, आस्थाएँ डूबने लगती है, भावनाएँ आहत होती हुई दिखाई पड़ने लगती है। हाँ अगर किसी मनोरंजन शो मे किसी की माँ, बहन, बेटी के साथ बलात्कार, अत्याचार या किसी और तरह के सामाजिक अपमान वाले दृश्य दिखाये जाये या किए जाए तो किसी की धार्मिक भावनाएँ आहत नही होती। सब मजे से उसका लुत्फ उठाते है। क्या ये लुत्फ उठाने वाले वही लोग होते है जो धर्म को अपने सीने से लगाये घूमते है, तब क्या उनकी धार्मिक भावनाओं पर चोट नही लगती।
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हाल मे ही प्रदर्शित एक फिल्म “ओह माई गॉड” मे जो वक्त्व्य दिखाये गये, उस पर भी सभी धर्मों के लोगो की धार्मिक भावनाएँ आहत हुई थी, आस्थाओं की चूले हिलने लगी थी, परिणामस्वरूप खूब विवाद हुआ, फिल्म प्रदर्शित होने से रोका गया, अंततः फिल्म सबके सामने आया और नतीजा सबने देखा। फिल्म “राम-लीला” नाम से ही धार्मिक समुदाय खफा हो गये, फिर विवाद हुआ, फिल्म को रोका गया, नतीजा क्या हुआ, कि उन धार्मिक समुदाय को बहकाने के लिए फिल्मकारों ने फिल्म का नाम “रामलीला” से पहले छोटे-छोटे शब्दो में “गोलियों की रासलीला” लिख दिया, बस फिल्म प्रदर्शित हो गया, सबके सामने आ गया, फिर चोट नही पहुँची किसी को, जबकि अब भी लोग “रामलीला” ही देखकर आ रहे थे सिनेमाघरो से, लोगों की जुबान पर सिर्फ “रामलीला” ही था न कि “गोलियों की रासलीला- रामलीला”, क्या खूब बेवकूफ बनाया फिल्मकारों ने धार्मिक लोगों को। हंसी आती है ऐसी धार्मिक भावनाओ को देखकर। और भी बहुत सारी घटनाएँ जेहन में आती है लेकिन जो तत्कालीन घटना है वो है कलर्स टीवी पर प्रसारित बिग बॉस का शो जिसमे एक ही घर में एक तरफ जन्नत तो दूसरी तरफ जहन्नुम दिखाया गया है, बस इसी बात से खफा है उस विशेष सुमदाय के लोग। जबकि सही मायनों मे देखा जाये तो ये जीने का अपना अपना तरीका होता है कि वह अपनी जिन्दगी को जन्नत बना ले या जहन्नुम, इसी दुनिया में वह दोनो में से किसी एक को अपने कर्म के अनुसार हासिल कर सकता है, अपनी जिन्दगी को जन्नत और जहन्नुम का तोहफा दे सकता है। लेकिन नही, उस धार्मिक समुदाय को ये बात पची नही। खफा हो गये, जबकि उन्हे भी इसका इल्म न होगा कि कहाँ जन्नत है और कहाँ जहन्नुम। उन धार्मिक किताबो से देख लिया होगा, पढ़ लिया होगा बस और उसी के लिए लड़ने चल दिये। उन किताबों मे लिखे बातो का अर्थ न समझा होगा, उन तथ्यों को बिना समझे तोते और कबूतर की तरह रट लिया होगा, बस अपने अन्दर के शैतानो को भोजन देने के लिए चल दिये लड़ने, ऐसे लोग कहीं से भी धार्मिक नही, सिर्फ धार्मिक होने का ढ़ोंग करते है।
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कहीं-न-कहीं यह धर्म के प्रति मानसिक विक्षिप्तता का परिचायक है जो ये नहीं समझ पाते कि धर्म हम मनुष्यों ने मनुष्यों के लिए बनाये है, लेकिन आज मनुष्य धर्म के लिए जीता है और धर्म के लिए मरने को तैयार रहता है, धर्म के नाम पर दंगे करते है और लाशों का ढ़ेर लगा देते है, क्या यही है धर्म? और यही सिखाता है उनका धर्म, अगर वाकई में धर्म ऐसा है, जो एक-दूसरे को मार डालना सिखाता है, जो एक हंसी मजाक नही समझता, जो मनुष्य को मनुष्यता नही सिखा सका, ऐसे धर्म को बदल देना चाहिए, इससे तो अधार्मिक होकर जीना अच्छा है, जहाँ कम-से-कम किसी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचने का खतरा तो नहीं।



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