BHAGWAN BABU 'SHAJAR'

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लाचार

Posted On: 22 Dec, 2013 कविता,Celebrity Writer,Hindi Sahitya में

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आ गया था गर्भ से
बीज मैं बाहर अब
हंस रहे थे सब यहाँ
बस रो रहा था मैं
डर रहा था और
सहमा हुआ था मैं
दृश्य लीला मानवों का
गर्भ से देखा था जो
क्या करेंगे साथ मेरे
सोचकर ये बात अब।
.
मैं इसी सदमें था
मैं इसी उलझन में था
कि अचानक पास कोई
हाथ में कुछ खास लेकर
आ गया मुझको मनाने
आ गया मुझको हंसाने
मै भी कुछ ये सोचकर कि
आयेंगे बहुत दर्द के दिन
एक पल तो मुस्कुरा लें
इसलिए जरा हंसने लगा अब।
.
हंसते हुए हमने ये देखा
हालात समझने का सा था
सब हंस रहे थे
मै हंसा रहा था
रोता जब था मैं वहाँ
रंग-बिरंगे मिलते थे कुछ
और लाचार बेवस की तरह
एक हाथ से दूजे हाथ को
एक खिलौना के लिए
खिलौना मैं बनता रहा अब।
.
निकलकर जिस जाल से
आया था जिस चाह से
दूर-दूर तक थे नही
उसके एक भी किरण
इसी आस में बैठा था मैं
कुछ पास में भी थे बहुत
कर रहा था इंतजार मै
अपनी भी कुछ सुनाने को
इसी उधेड़बुन में बस
दिन-रात युँ कटता रहा अब।



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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Madan Mohan saxena के द्वारा
December 24, 2013

अच्छा प्रयास सुन्दर कबिता कभी इधर भी पधारें सादर मदन

    Bhagwan Babu 'Shajar' के द्वारा
    December 26, 2013

    मदन मोहन जी… आप एक अच्छे लेखक है … मै आपकी रचनाएँ पढ़्ता हूँ .. उस पर प्रतिक्रिया देना भी चाहता हूँ लेकिन आजकल मेरे ब्लॉग में कुछ खामियाँ आ गई जिसकी वजह से मैं किसी लेख पर अपनी प्रतिक्रिया नही दे पाता हूँ … मैने जागरण पर इसकी शिकायत भी की परंतु इसका कोई असर न हुआ… .. आपने इस रचना पर अपनी प्रतिक्रिया दी… आपका धन्यवाद…

    savita mishra के द्वारा
    December 26, 2013

    सुन्दर

    Bhagwan Babu 'Shajar' के द्वारा
    December 27, 2013

    सविता जी…. आपका बहुत बहुत धन्यवाद….


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