BHAGWAN BABU 'SHAJAR'

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मोहब्बत के अफसाने

Posted On: 26 Dec, 2013 social issues,कविता,Junction Forum में

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मोहब्बत के अफसाने कम हो रहे है।
शहर में मज़हबी दंगे बहुत हो रहे है।।
.
धुली थी यहीं माँग बहू बेटियों की,
आज देखा वहाँ तो तिजारत हो रहे है।
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किसकी थी आरज़ू ये फिक़्र उसका नही,
हसरतें कैसी भी हों मुक्कमल हो रहे है।
.
कल तक तो थी उनकी यहीं झोपड़ी,
किया ऐसा क्या जो वो महल हो रहे है।
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दो पल भी भरोसा न होता किसी का,
मगर खड़े उनको यहाँ अज़ल हो रहे है।
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अच्छी बातें न दिखती है नित होते हुए,
उनकी तो बस कहानी, ग़ज़ल हो रहे है।
.
बदल गये है जमाने देख ले ऐ “शजर”,
रग़बतें दिल से अब मुख्तसर हो रहे है।



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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

ashishgonda के द्वारा
December 27, 2013

कल तक तो थी उनकी यहीं झोपड़ी, किया ऐसा क्या जो वो महल हो रहे है। बहुत अच्छी पंक्तियाँ हैं. दिल से निकल कर सीधे दिल तक पहुँच रही है….इतनी अच्छी रचना को जन्मदेने वाली लेखनी को प्रणाम.

    Bhagwan Babu 'Shajar' के द्वारा
    December 27, 2013

    आशीष जी… आपने मुझे बहुत सारा प्यार दे दिया… आपका बहुत बहुत आभार… शुक्रिया…

Veer suryavanshi के द्वारा
December 26, 2013

और में कब से अगली ग़ज़ल की राह देख रहा था |

    Bhagwan Babu 'Shajar' के द्वारा
    December 26, 2013

    इंतजार करने के लिए शुक्रिया… .. और देरी के लिए माफी चाहते है… धन्यवाद…

दीपक के द्वारा
December 26, 2013

आप ने जिस ठग से समाज की बुदबुदा सच्चाई को अपने शब्दो मे ढालकर उजागर किया है वह काबिले तारीफ है

    Bhagwan Babu 'Shajar' के द्वारा
    December 26, 2013

    धन्यवाद दीपक…


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