BHAGWAN BABU 'SHAJAR'

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जरा धीरे चलना - Contest

Posted On: 10 Jan, 2014 कविता,Junction Forum,Contest में

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काँटों भरी है जिन्दगी, जरा धीरे चलना
ढ़ल रही है शाम अब, जरा धीरे चलना
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पी लिया है फ़लसफ़ा, हर ज़ाम में उसने
बहकने लगे है कदम, जरा धीरे चलना
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जा रहे हो ढ़ूँढ़ने, ईकतारा लेकर
वीरान है उसकी गली, जरा धीरे चलना
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मज़हब यहाँ पर बन चुके है, अब खिलौने
पिचकारियों से है रौंदते, जरा धीरे चलना
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छाई हुई है सूबे मे, एक फ़रेब-ए-हलचल
कुछ घोंसलों में हैं परिन्दे, जरा धीरे चलना
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फूस का घर है मेरा, कारवां-ए-पील उनका
रहबर मेरे हरेक से कहना, जरा धीरे चलना
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होश इतना भी रहे, कि खुद उठ सको
इतना समझकर ऐ ‘शजर’, जरा धीरे चलना



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5 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

R K KHURANA के द्वारा
February 10, 2014

प्रिय भगवान बाबू जी, रचना के पुरस्कृत होने पर आपको बहुत बहुत बधाई ! राम कृष्ण खुराना

yamunapathak के द्वारा
January 19, 2014

AAPKEE हर ग़ज़ल बहुत ही उम्दा है.

    Bhagwan Babu Shajar के द्वारा
    January 19, 2014

    तारीफ करके जो आपने हौसला बढ़ाया है उसके लिए बहुत बहुत धन्यवाद…

January 10, 2014

बहुत सुन्दर    भावनात्मक अभिव्यक्ति . .आभार

    Bhagwan Babu Shajar के द्वारा
    January 11, 2014

    सुन्दर टिप्पणी के लिए बहुत बहुत धन्यवाद…


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